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Tuesday, July 21, 2015

आत्मा में उतर जाने वाली मियाँ की मल्हार !

जियरा है कि ख़ुद-ब-ख़ुद आत्मा के तानपूरे पर मियाँ की मल्हार छेड़ रहा है. रूठे बादल ने मौसम विभाग के अनुमानों को धता बताते हुए साबित कर दिया है कि वह किसान के आँसू का मान जानता है. इन दिनों में मालवा जिस तरह तरबतर हुआ है उससे इस बात पर यक़ीन हो आता है कि ऊपर वाले के यहाँ देर है अंधेर नहीं. जून-जुलाई की उमस ने अपने पैर पसारे थे उससे लग रहा था कि इस बार हमारे काश्तकार भाईयों की जान साँसत में है . लेकिन भला हो नीली छतरी वाले का जिसने अवाम को आसूदगी बख्श दी. मालवा का पठार जिस आबोहवा और तसल्ली के लिये जाना जाता है वह गुज़रे कल का हो गया. बीते दशकों  में सीमेंट-काँक्रीट के जंगले खड़े कर हमने पर्यावरण के साथ जो मज़ाक किया है उसका ख़ामियाज़ा तो हम शहरियों को भुगतना ही है लेकिन बेचारे किसान का क्या कुसूर ? वो आज भी कमर कस के,खेत में बादलों से बरसती बूँदों के साथ अपने श्रम का पसीना बहा कर धरती माँ के पाँव पखार रहा है. देखते-देखते हमने बारिश का आनंद लेने की तमीज़ भी खो दी है. एक वक़्त था जब सावन-भादौ की झड़ी का असर देखने मित्रों के साथ बिलावली, यशवंत सागर,सिरपुर जाने का जोश जागता था. माँडू में गाते हुए रूपमती-बाजबहादुर की रागदारी हमें मोहती थी. अब हम सिर्फ़ मोबाइल पर ही वॉट्स-एप्प वॉट्स-एप्प खेल रहे हैं और मन को रूखा बना रहे हैं. बरसते मेंघों का लुत्फ़ अपने बदन उतार में लेने के बजाय मोबाइल की तस्वीरों पर उतार रहे हैं. लगता है कि हमारे जज़बात कुछ इस कदर सूख गए हैं कि मन-के आनंद का पानी ठाठे ही नहीं मारता. पोखर में अपनी काग़ज़ की कश्ती को बहाने के लिये मलचने वाली नस्ल अब न जाने कहाँ चली गई. आई-पैड और फ़ेसबुक के चोचलों में हमने इंसान और उसकी भावनाओं की जुगलबंदी को ही बिसरा दिया है. अब हम भीगने से कतरा रहे हैं. वजह साफ़ है कि मन का भीगापन ही कहीं गुम हो गया है. एक समय था कि मेघराज की गड़गड़ाहट के साथ पडौसी को अपने घर बुला कर प्याज़,पालक और मिर्ची के भजिये खिलाने में आनंद आ जाता था. अब हमने पड़ौस ही खो दिया है. लेकिन अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है. हम चाहें  तो अब भी उस खूबसूरत मंज़र को ज़िन्दा कर  सकते हैं.. कुदरत तो दावत दे ही रही है कि ज़रा बाहर आओ और नहा लो इन बौछारों के नीचे. यूँ तो हमें कभी फ़ुरसत नहीं मिलने वाली है लेकिन एक बार तय कर लिया कि प्रकृति के प्रसाद का आनंद लेना है तो ज़रूर ले सकेंगे. फ़ख्र कीजिये कि हमारे यहाँ ग्रीष्म,शिशिर और शरद जैसी तीन-तीन ऋतुएँ हैं. इनका आना-जाना जीवन में परिवर्तन की भावभूमि रचता है.ये बरखा रानी भी आगामी दिनों में हमारे कैलेण्डर में आने वाले उत्सवों के मंगल-गीत गा रही है. कमर कस लीजिये और कमरे से बाहर आकर इन शीतल फ़ुहारों का अभिनंदन कीजिये.ये आई हैं,बिना किसी बुकिंग के,बिना किसी एडवांस के और बिना किसी बिल के ….ये तो अपना दिल आप पर लुटाने आई है.सुर में गाइये-बेसुरे होकर गाइये…लेकिन गाइये……नन्हीं नन्हीं बूँदिया मेहा बरसे….नहीं तो ग़ुलाम अली की कजरी सुन लीजिए……बरसन लागी सावन बुँदिया राजा….तोरे बिन ना लागे मोरा जिया….या फ़िर भारतरत्न भीमसेन जोशी का बादरवा बरसन लागी सुने……और नहीं तो हमारे इन्दौर की आन उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब के धीर-गंभीर स्वर में रचा मेघ का कैसेट लगा लें…..बरखा ऋतु आई….. इन सभी सुरीली चीज़ों को बरसते पानी में सुनने का मज़ा कुछ और है…मशवरा सिर्फ़ इतना है कि कुदरत के निज़ाम का इस्तेकबाल कीजिये हुज़ूर…..अल्लाह की ये नेमत किसी शहंशाह के हुक़्म की तामील भी नहीं करती और किसी ग़रीब की प्रार्थना पर भी हाज़िर हो जाती है……ये बूँदें किसी स्नैपड़ील या अमेज़न डॉट कॉम पर ऑर्डर नहीं की जा सकती…...बस ह्रदय के सच्चे गीत की टेर लगाइये कि  बरखा रानी हम अंत:करण से तुम्हे बधाते हैं 

Thursday, August 26, 2010

हम चाहते नहीं,फ़िर दु:ख क्यों आता है !



तन की पीड़ा मिटाने की अनेक औषधियॉं हैं । इन औषधियों के निर्माण, प्रचार-प्रसार और वितरण के भी अनेक साधन हैं । किन्तु, मन की पीड़ा मिटाने की औषधि कहॉं मिलेगी ? हमारे यहॉं, संतों-महात्माओं, मनीषियों, गुरुओं और औलियाओं ने आध्यात्मिक रास्ते से अनेक उपाय सुझाए हैं स्वमन को दुरूस्त करने और वृत्तियों में पलने वाले दुःख को दूर करने के। शास्त्र भरे पड़े हैं हमारे यहॉं मन को स्वस्थ करने के बारे में । दरअसल, यह भी तो जाना जाए कि मन के दुःख के कारण क्या हैं ? उनका निवारण क्या है ? कहते हैं मन चंचल है । मन पागल है । मन बावरा है । मन मानता नहीं । मन माने कैसे ? यह मनमानी करता है । सच तो यह है कि मन के दोष का मूल कारण है देह का अभिमान। अनेक विकारों में, यह अभिमान ही मुख्य है । जब आप देह अभिमानी होते हैं तब आप जड़ वस्तुओं, व्यक्ति, वैभव, साधन और देह की दुनिया के आकर्षण में ही लगे रहते हैं । उनके प्रति लगाव का मिथ्या भान ही मन की पीड़ा का मुख्य कारण है । असल में देह और देह से लगे संबंध, पदार्थ और उनके आकर्षण नाशवान हैं और जो नाशवान हैं, अविनाशी नहीं हैं, स्थाई नहीं हैं, वे दुःख देते हैं । जब नाशवान देह के इर्द-गिर्द ही नाशवान आकर्षण रहेंगे तो स्थाई सुख मन को कैसे मिलेगा ? नहीं मिलेगा । देह अभिमानवश जब मन, वस्तुओं और वैभव में फॅंसा रहेगा तो स्थाई सुख-शांति दिवास्वप्न ही होगी। स्थाई सुख-शांति किसी नुमाइश में नहीं मिलती । किसी बाज़ार में नहीं बिकती । कहीं मोल ख़रीदी नहीं जाती । सुख और शांति की निर्मिति तो ऐसी नियामत है जो मन के शुभ संकल्पों में ही पलती है । शुभ भावनाओं, शुभकामनाओं, शुभधारणाओं के मखमली आवरण में ही लिपटे होते हैं सुख और शांति । शुभकामना और रहमदिली की वृत्ति जब भी बनेगी, प्रवृत्ति सात्विक होगी और वही हमारी दृष्टि और वृत्ति को आकार देकर मन को निरोग करेगी । मन को निरोग बनाने के लिए सत्संगत और सु-संस्कार ज़रूरी हैं और इसके लिए सत्संकल्पों का खाद-पानी नितांत आवश्यक है । यह भी सच है कि हम जितने अंतर्मुखी होंगे, आत्मस्वरूप होंगे, परमात्म स्वरूप में चिंतनरत्‌ होंगे, गुणों की धारणा में होंगे; उतने ही पवित्र मंशा में भी होंगे । मंशा अर्थात्‌ जब हमारी नीयत (इंटेन्शन) पवित्र होगी, तब हमारा मन अविकारी होगा और हमारे व्यर्थ संकल्प विदा होंगे, निरर्थक विचार निर्मूल होंगे । हम निराशा, हताशा, ईर्ष्या और द्वेष से मुक्त होंगे । जब मन स्वतः निर्मल होगा तो हमारे चेहरे पर रूहानी चमक होगी ही, रूहानी मुस्कुराहट थिरकेगी ही !

Sunday, December 27, 2009

गणेश - व्यवहार को पवित्र बनाने वाले परम प्रेरक देव

गणेश हमारी संस्कृति के मंगलमूर्ति देव हैं । वैसे तो हमारे समस्त देवी-देवताओं में दातापन है, किन्तु गणेश मंगलदाता हैं । वे सारे काज निर्विघ्न पूर्ण करते हैं । हमारे लोकगीतों में उनकी प्रशस्ति के गीत हैं । मालवी लोकगीतों में तो गणेश की पारस की मूर्ति बनाने की कल्पना है, जिसे छू कर हमारा विकारी जीवन स्वर्ण बन जाए । दरअसल, गणेश हमारे सोच, चिंतन, धारणा और व्यवहार में इसलिए पूजनीय हैं क्योंकि वे गुणों की खान हैं । उनमें समस्त गुण और शक्तियॉं शोभायमान हैं । श्री गणेश अर्थात्‌ श्री गुणेश । वे श्री अर्थात्‌ श्रेष्ठ तो हैं ही, देवताओं में गुणों के देव हैं ।
आज जगह-जगह अमंगल का साम्राज्य है । दुर्गुणों का बोल-बाला है । हिंसा, क्रोध और विकारों से भरपूर है पूरा जीवन । विवेक लुप्त है । सहानुभूतियॉं गुम हैं । धर्म के नाम पर आडम्बर शीर्ष पर है। मनुष्य मात्र जैसे अपने लक्ष्य अर्थात्‌ अन्तरदर्शन को भूल गया है । ज्ञान और विवेक ही जब विलुप्त है तो फिर आदमी से दैवोचित व्यवहार की उम्मीद कैसे की जाए ? गणेश हमें दैवोचित गुणों को धारण करने की प्रेरणा देते हैं ।
सच पूछो तो हमारे देवताओं की पवित्र नज़रों में निहाल करने की शक्तियॉं हैं । इसीलिए तो आज भी उनकी जड़-मूर्तियों के सम्मुख लाखों, हज़ारों लोग सिर टेकते हैं, मतें मांगते हैं और कल्याण की कामना करते हैं । गणेश विघ्न-विनाशक मंगलमूर्ति देव ऐसे देव हैं जिनका दर्शन मात्र हमारे समस्त विकारों का नाश करता है । गणेश हमारे बोल, संकल्प, दृष्टि, चलन, व्यवहार को पवित्र बनाने वाले परम प्रेरक देव हैं । गणेश की आकृति ही स्पष्ट रूप से सिद्ध करती है कि उनका स्वरूप सचमुच दैवी गुणों की आकृति है। गणेश की आँखें छोटी हैं जो हमें सिखाती है कि हमारी दृष्टि सूक्ष्म हो । गणेश के सूप जैसे कान बताते हैं कि हम दुनिया की बातें सुनें, सबकी सुनें, किन्तु अचल-अडौल बने रहें । गणेश का छोटा मुँह इस बात का प्रतीक है कि हम कम बोलें, कम आकांक्षाएँ रखें ।
गणेश का बड़ा सिर विवेक का प्रतीक है । गणेश का बड़ा पेट सूचक है सहनशीलता का, समाने का । विशाल उदर, उदारता का प्रतीक है । गणेश की सूँड अद्‌भुत परख-शक्ति की प्रतीक है । गणेश का वाहन चूहा है । चूहा हमारे साधनों को कुतरता है, काटता है, अर्थात्‌ समर्थ को व्यर्थ बनाता है । हमें ऐसे तमाम साधनों को अपने वश में करके रखना चाहिए जो व्यर्थ को बढ़ावा देते हैं, उन्हें दबाकर रखना चाहिए, चाहे ये साधन कितने ही छोटे क्यों न हों । कहने का तात्पर्य है कि जब हम गणेश जैसे विकार रहित हो जाएंगे तो स्वयं मंगल-मूरत बन जाएँगे । गणेश की प्रशस्ति और पूजा इसी में है कि हम गणेश के स्वरूप को अपने गुणों में धारण करें ।